गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

आंधियाँ

                                                            
                               आंधियाँ 

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Raahi ki Manjil


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मुश्किलों से खंड खंड  हो जाऊं 
                     ऐसी  मृण मूरत मै  नहीं। 

जकड़ जाए राह के मोह में 
                      ऐसी भोली सूरत मैं नहीं।


पत्थर को पिघला सकता हूँ 
                      ये घमंड नहीं साहसी वक्तव्य हैं  मेरे । 

हर उस विपदा  को लांघ जाऊं 
चाहे आएं राह  में गिरि -कण्टक बहुतेरे। 

मैं तो बस  इतना जानूं  .........

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तारनहार

Jai Shree Krishna






यदि कलयुग में भगवन श्री कृष्ण अवतार लेते हैं तो किस तरह से उनका चरित्र होगा ,  कैसे विश्व कल्याण करेंगे, आइए कल्पना करते हैं ;


तारनहार 

लो  हुआ विश्व बदलना शुरू,
पाकर  प्रकृति से अद्विज उपहार। 
रख चुका  कदम देखो धरती पर,
बनकर कान्हा तारनहार। 

सदियों से देख दशा विश्व की,
सचनुच कान्हा बड़ी पीर में था। 
ना  मिला माध्यम उसे कोई,
इस कारण  कान्हा  अब तक धीर  में था। 


हुई खोज पूर्ण उसकी,
मिली  नौका  हेतु  पतवार। 
रख चुका  कदम देखो धरती पर,
बनकर कान्हा तारनहार। 
  
श्रीकृष्ण कहते हैं -

रोंद  रहा  है  मानव निश्छल ईमान को,
हर तरफ  मैंने  बेईमानी  फ़रेब  देखा। 
हार ही प्रतिक्षण नसीब हुई ,
जहाँ  भी मेने  पासा  फेंका। 

किन्तु ज्ञात  यह था मुझको,
कहीं  तो मेल खाएगी मेरी ह्रदय  रेखा। 
कारण मेरे धीर  तलक ,
बदलूंगा अब मानव  तकदीर का लेखा। 


क्यूंकि तलाशा है  मैने ,
प्रकृति का अनमोल उपहार। 
रख चुका  कदम देखो धरती पर,
बनकर कान्हा तारनहार। 


धरूंगा न मानव रूप  कोई ,
मै  सोच में  सबकी आऊंगा। 
वो शक्ति होगी सोच में कि 
युग परिवर्तन मै  क्र जाऊंगा। 

मुझे जान मानव आम,
जग अंधेपन में जाएगा। 
सोच सकेगा जो सोच मेरी,
वही बीएस जान मुझे पाएगा। 

मै  ऐसी सोच को रखूँगा ,
पृथ्वी पर नव चमन खिलाने  को। 
अटल-स्वच्छ-परोपकारी सोच से से,
भक्त से भगवन  मिलाने को। 

हाँ जान स्का इतना बस अब तक,
यह कर्म जरा कष्टदायी है,
किन्तु वत्स ! 
मत भूलो मेरी अदम्य सोच के  आगे तो,
विशाल गिरी  भी मेरे लिए एक राई  है। 

उठते  उठते यह देखो,
कदम है मेरा उठ रहा। 
आजादी मन की पाता ,
वो मानव अब तक  जो काल में घुट रहा। 

पापी नहीं है  मानव इस जग में,
तुच्छ सोच ने पाप बढ़ाया है। 
कुछ यही सोच  कर  मैं ने 
रूप स्वच्छ सोच का पाया है।  


हाँ है   मानव ही माध्यम मेरा,
 सोच है जिसकी अपरंपार। 
रख चुका  कदम देखो धरती पर,
बनकर कान्हा तारनहार। 



जीव  जीव को देख जीव,
वो जीव  निर्जीव बनाने चला। 
रिश्ता  नाता न दि खता  कहीं,
वो दौड़ा मानव,मानव का काटने गला। 

फ़रक  रहा है इतना इसमें,
कोई प्रत्यक्ष काटे तो कोई परोक्ष रूप से। 
कोई सोचे वो जो करे सब छुपा है,
नहीं आश्चर्य !
क्या छुपा है इस दुनिया का मुझसे। 

हर रूप में मानव बना शत्रु मेरा,
हंस  कर मुझ पर पाप वह अपनाता  है।  
रिश्ता चाहे हो कितना भी गहरा,
क्यों सच को आज वह झुठलाता है।  

आज नहीं तो कल,
यह सच तो सम्मुख आएगा। 
आज जो  हँसता है मुझपे,
कल शीश झुका कर  जाएगा। 

अहम नहीं है यह मेरा,
यह परिवर्तन है आने वाले कल का। 
युग परिवर्तन से आनंद में मानव खेलेगा,
पाकर अहसास मेरा इक पल का। 


मैं  रोम रोम में  बस  जाऊंगा ऐसे,
अधर्म विचार न आने पाएगा। 
नाश होगा अधर्म छल कपट का,
हाँ मानव ज्ञान सत्य का गाएगा। 

युग परिवर्तन का हुआ आरम्भ,
करे अचरज बैठा जग का पालनहार। 
रख चुका  कदम देखो धरती पर,
बनकर कान्हा तारनहार। 

अजेय शक्ति का था द्योतक
        तर्जनी धारित मम सुदर्शन।  
    कुछ ज्यादा ही होगा शक्तिशाली 
         इस बार मम वाणी और लेखन।

सुदर्शन हत्या नहीं होगी
न तर्जनी किसी कोप दिखाऊंगा। 
कर आप हत्या वाणी से 
मैं  विश्व ज्योति जलाऊंगा। 

मुरली मुरली मनोहर मुरली 
बिन बंशी राग सुनाऊंगा। 
रज रज में बीएस कर मानव के 
मैं पाप हर ले जाऊंगा।   

बंशी युग जो चला गया 
वही राग मुझे दोहराना है। 
किन्तु पहले स्वेच्छा से गाता था 
विश्व इच्छा का राग मुझे अब गाना  है।

जिन हाथों  मे बंशी रखता था 
उनमें  विश्व शस्त्र  लिये है घूम रहा 
धमकाता मारता मानव को वह  देखो 
कदम है पापी चूम रहा। 

सीना ठोक  यह कान्हा कुछ कहना चाहता है 
उन्ही हाथों  में मैं फिर से बंशी लाऊँगा 
जो राग मैं पहले गता था 
इस विश्व से वो राग गवाऊंगा। 

हाँ सादा  चोला पहन 
खाली हाथ लिया अवतार। 
रख चुका  कदम देखो धरती पर,
बनकर कान्हा तारनहार। 

"राही "
              किशोर आचार्य