मत रोको मुझे, मै गाँव लौटना चाहता हूँ......
गाँव की शुद्ध सांस से लेकर,
शहर की विषैली सांसो में भी जीया था।
नदी झरनों का अमृत पीने से लेकर ,
मशीन छनित नीरस पानी पीया था। .
बहुत खेला अब ये विष , नीरसता का खेल,
अब इस विष का गला घोटना चाहता हूँ ,
मत रोको मुझे,
मैं अब गाँव लौटना चाहता हूँ।
गाँव की कच्ची झोपड़ियों में रहकर,
चरम संतुष्टि और ठंडक पाई थी।
शहर की पक्की मंजिलों में तो बस,
धरती को गर्म करती ए सी की ठंडक आई थी।
बहुत हुआ ये सीमेंट मकानों में,
घुटित वातानुकूलन का खेल,
में फिर से गाँव की झोपड़ी,
गोबर से पोतना चाहता हूँ।
मत रोको मुझे,
मैं अब गाँव लौटना चाहता हूँ।
खेतों की मेड़ो पर दौड़ने से लेकर,
शहरी जोग्गिंग पार्को में दौड़ लगाई थी।
जो खुले सरस खेतो में पाई,
वो प्राकृतिक रास यहाँ मुझे न आई थी।
बहुत हुआ अब ख़चाखच भरे उद्यानों में,
तरसती शुद्ध हवा का खेल,
में फिर से गांव की गलियों -मेडों में,
जी भर के दौड़ना चाहता हूँ।
मत रोको मुझे,
मैं अब गाँव लौटना चाहता हूँ।
गाँव में कबड्डी कसरत से लेकर,
शहरी जिमों में भी धन-बल लगाया था।
जो बल,प्रेम यादों का मिलता ,
वो शहरी अखाड़ों में कहाँ पाया था।
बहुत हुआ बस ये शहरी,
जिम-जोग्गिंगों का खेल,
कसरत को पूरा कर खेतों में,
हाथों से हल जोतना चाहता हूँ।
मत रोको मुझे,
मैं अब गाँव लौटना चाहता हूँ।
बाजरे की रोटी ,दही, राबड़ी से लेकर,
शहरों में बर्गर पिज़्ज़ा खाया था।
खेतों से खुद सांगरी लाकर खाने का,
वो मजा बर्गर पिज़्ज़ा में कहाँ पाया था।
बहुत हुआ नूडल,बर्गर -पिज़्ज़ा ,
और चाउमीन का खेल,
अब फिर से चूल्हे की राख में,
आलू,शकरकंद ओटना चाहता हूँ।
मत रोको मुझे,
मैं अब गाँव लौटना चाहता हूँ।
सुबह शाम टीलों की ठंडी रेत के आनंद से लेकर,
भीड़ भरी पिकनिकों का आनंद उठाया था।
जो आनंद लंगोटियों के साथ पाया था ,
वो पिकनिकों में कभी न लौटकर आया था।
बहुत हुआ ये औपचारिक ,
नीरस जमावड़ों का खेल,
उसी ठंडी माटी में,
मैं फिर से लोटना चाहता हूँ।
मत रोको मुझे,
मैं अब गाँव लौटना चाहता हूँ।
सम रस हर्ष उल्लास भरी गाँव की,
दीयों की दिवाली न और कहीं पाई मैंने ,
शहर में देखा, लोगों बस मिठाई बाँट,
अपनी अपनी दिवाली मनाई थी।
बहुत हुई ये ऊपरी मन की,
औपचारिकता की होली दिवाली,
गुलगुले बड़े खाकर मित्र भाइयों के संग,
मैं फिर से पोटाश फोड़ना चाहता हूँ।
मत रोको मुझे,
मैं अब गाँव लौटना चाहता हूँ।
घर से निकल , कर राम-राम सभी को,
सबसे आशीर्वाद पाया करता था।
झूठी मुस्कान के साथ शहर में,
गुड मॉर्निंग गुड नाइट का गीत गाया करता था।
बहुत हुआ ये पाश्चात्य अभिनन्दन,
छोटों से गले मिल, बड़ों के पाँव धोकना चाहता हूँ।
मत रोको मुझे,
मैं अब गाँव लौटना चाहता हूँ।
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पंछियों की चह -चहाहट की सुबह ,
तन मन के तार छेड़ते जाती थी।
शहर में घुटते कमरे में बस ,
तीखी घंटी अलार्म की उठाए जाती थी।
बस हुई ये कारखानों की कल-कल,
अब शांत संध्या भोगना चाहता हूँ।
मत रोको मुझे,
मैं अब गाँव लौटना चाहता हूँ।
छाछ ,शिकंजी ,गन्ने का रस ,
गांव की गरमी के रंग मतवाले थे।
डोमिनोज़, सी सी डी , ज्यूस बार,
मुझे ये सब कहाँ रास आने वाले थे।
चलती लू और आँधी में ,
मैं तरबूज़ -मतीरे फोड़ना चाहता हूँ।
मत रोको मुझे,
मैं अब गाँव लौटना चाहता हूँ।
फिर से समय मिलते ही कुछ मुद्दे और जोड़ने की चाह के साथ, सधन्यवाद /
"राही "
किशोर आचार्य
सुंदर रचना।
जवाब देंहटाएंगांव की गालियां, मीठा दलिया।
मठा अधचला, दूध की नदियां।
Nice one 👌
जवाब देंहटाएंअद्भुत रचना
जवाब देंहटाएंKavi var ko mera sadar pranam sa..
जवाब देंहटाएंKavi var ko mera sadar pranam sa..
जवाब देंहटाएंशानदार कविवर बहुत खूब छाछ राबड़ी के संग काजर बोर मतीरा अभिनंदन बहुत-बहुत अभिनंदन
जवाब देंहटाएं🤗👌
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